मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

आदमी का व्याघ्र मन


यह स्केच १९८८ में ही बनाया गया था यूँ ही बैठे ठाले.हर आदमी के भीतर एक हिंसात्मक प्रवृत्ति होती है। मेरा यह स्केच आदमी की उस हिंसात्मक प्रवृत्ति को समर्पित है.मैंने इसका नाम इसलिए "आदमी का व्याघ्र मन" रक्खा है.मैंने पूर्व में २ मार्च को "व्याघ्र मन " शीर्षक से एक रंगीन चित्र अपलोड किया था जो हाल में ही बनाया था..दोनों का थीम एक ही है पर तरीका व्यक्त करने का अलग अलग .

5 टिप्‍पणियां:

  1. देख लिया मन किस तरह होता है अलग अलग परिस्थितियों में ...आपका प्रयास सराहनीय है

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  2. असत्य से सत्य की ओर - अन्धकार से प्रकाश की ओर- म्रत्यु से अमृत की ओर ! ये जो प्रार्थना है उसमें मैंने भी अपनी एक लाइन जोड़ी है बचपन से ही - मन से अमन की ओर !

    सुन्दर चित्र !

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